Monday, October 29, 2012

55 word story . Theme "Wonder"

After a long time I wrote a 55 word story. The theme is "wonder" and here it is

The poor kid wondered how it will be to be the man on bike.
One on bike wondered about the guy on bike with a girl on pillion.
That guy wondered about the one in car.
 Fat guy in car wondered about the fit guy on that bike, with a girl behind.
Everybody dies wondering.

Friday, October 26, 2012

HK ka Vadh

(अगर Hindu Mythology से कभी वास्ता नहीं पढ़ा है तो हिरन्यकश्यप और प्रह्लाद की स्टोरी यहाँ पढ़ लीजियेगा. वैसे अच्छा भी है अगर वास्ता नहीं पड़ा क्यूंकि मेरी कहानी का उस  कहानी से ज्यादा वास्ता नहीं है. Inspired है थोड़ी बस. वैसे for due credits इस  पोस्ट का आईडिया शिव मिश्र जी के एक उम्दा देवी अहिल्या पर के पोस्ट से आई थी. उनके ब्लॉग पर ये पोस्ट पढने के बाद जाइएगा क्यूंकि वापस आने के चांसेस कम हैं फिर. )


होलिका जल चुकी थी. हिरण्यकश्यप को बड़ा कटा कटा सा प्रतीत हो रहा था. और इसके आगे हम हिरण्यकश्यप को HK के नाम से पुकारेंगे. पूरा नाम सुनना है तो इस युग के उत्पाद की कहानी क्यूँ सुन रहे हैं? जाकर वेद-पुराण बांचिये. या फिर ज्यादा शौक है तो श्री लंका के क्रिकेट खिलाडियों के नाम याद कीजिये.

ज्यादा दुःख था नहीं वैसे HK को होलिका के मरने का . थोडा vindictive सा ही फील कर रहा था. बड़ी आई थी सुपरमॉडल . दो दिन पहले ही ब्रह्मा-मॉल से फायर-प्रूफ दुपट्टा ले कर आई थी. प्रहलाद को लेकर टेस्टिंग करने गयी थी. अब ब्रह्मा-मॉल में कोई चीज़ foolproof थोड़े न मिलती है ? कोई वरदान भी खरीदो तो स्टार लगा कर कंडिशन एप्लाई लिखा होता है. गोया अगर उस ज़माने में blood bank का  concept होता तो थोड़े न रक्तबीज वैसे खून से पैदा होने का वरदान लेता?

HK ने इन सब से सबक लेकर ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च कर के वरदान खरीदा था. न दिन में, न रात में. न मानव के द्वारा, न देव के द्वारा और न पशु के हाथों. न घर में न बाहर. न अस्त्र से न शस्त्र से. आज कि तारीख में ऐसा माँगा होता तो नरसिंह कि जगह सिद्धु को आना पड़ता अपनी जोक्स कि पोटली ले कर HK को मारने.

तो ऐसा था कि प्रहलाद कि धुलाई हो रही थी बाप के हाथों. तुरंत विष्णु को गुहार लगाने लगा. अब इससे हमें स्कूल कि एक घटना याद आ गयी. एक बार हमारे एक टीचर ने एक लौंडे की कुटाई  कर दी. छुट्टी होने पर मास्टर साहब बाहर निकले तो पता लगा बच्चे ने फोन करके २०-२५ मुस्टंडो कि फौज बुला रखी थी उनको सबक सिखाने के लिए. अपने बच्चों का मुंह दुबारा देखने के लिए उन्हीं बच्चों की कसम खानी पड़ी की हाथ तो छोडो, आगे से आवाज़ भी नहीं उठाएंगे. प्रहलाद से ये तो सीखा ही था हमारे सहपाठी ने. इधर दो धौल पड़े नहीं कि विष्णु विष्णु शुरू. “अरे छेत्ती छेत्ती आ बे. ये कूट रहा है. माँ दी बहन दी करनी है इसकी. जय माता दी. लेट्स रॉक.”

और विष्णु को भी तो कोई काम होता नहीं था . हमेशा राक्षसों को चूतिया बनाने के तरीके ढूंढते रहते थे. कभी नचनिया बन कर अमृत ले कर भाग जाते थे तो कभी नरसिंह बन कर आ जाते थे. और पता नहीं क्यूँ किसी खूब सोने वाले कि तुलना हमेशा कुम्भकर्ण से की जाती है. ये क्यूँ नहीं कहते कि "अबे उठ , विष्णु की तरह सोया पड़ा है.” वो भी तो 4 महीने लगातार  सोते थे. देवसुतान एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक. और ऐसे भंड होकर सोते थे कि पता भी नहीं चलता था की सांप के ऊपर सो रहे हैं. ये जो पूरी हमारी  mythology है न राक्षसों की बुराई करने के लिए ही लिखी गयी है. ज़रूर किसी महिला ने लिखी होगी जिसे अपने पडोसी की बुराई करने में बड़ा आनंद आता होगा.

तो प्रहलाद कि तरफ वापस आते हैं. गरज बरस कर नरसिंह अभी तक खम्भे से निकल चुके थे.

HK बोला  “ई का है.”

जवाब में नरसिंह बस गरज और गुर्रा रहे थे.

“अब का तुम्हारे लिए google translate और soundhound का बंदोबस्त करें? साफ़ साफ़ बोलो क्या बोलना है. यश चोपड़ा की नक़ल करने की ज़रूरत नहीं है.”

नरसिंह को इस बात का बुरा नहीं लगा की उन्हें यश चोपड़ा से compare किया गया. पर इस बात का भारी सदमा पहुंचा कि उन्हें उदय चोपड़ा के बाप से compare किया गया. उन्हें अब बोलना ही पड़ा.

“हम तुम्हारा वध करने आये हैं मूरख.”

“अरे पता भी है हमारी मौत पर कितने सारे clauses aur sub clauses हैं ? जाओ पूरा पढ़ कर आओ. ये मुआ प्रहलाद कहाँ गया ?”

“वो सब हमें पता है. हमारा मेकअप तो देख नासमझ.”

अब HK को  कुछ माजरा समझ आया. 

“अच्छा अच्छा. तो हमें मारना क्यूँ है? क्यूंकि हम अपने बेटे की कुटाई कर रहे हैं इसलिए ?

नरसिंह कनफुजिया गए. अब ये कौन सा अपराध है. प्रहलाद नाबालिग था . और उसपर से भारतवासी था. यहाँ पर तो बड़ों से ठुकाई का रिवाज़ है. कोई अमरीका थोड़े न है. जो child welfare जैसा कुछ होगा. वैसे भी जिस देश में राहुल गाँधी जैसे लोग अभी तक अपने आप को child  ही समझते हैं, वहां  चाईल्ड वेलफैयेर जैसी चीज़ कि क्या ज़रूरत है.

HK को समझ आया गया कि यहाँ पर वो अर्नब गोस्वामी है. फिर क्या था . चढ बैठा.

“देखो पहले एक काम करो कि जाकर पहले उसका साइन लेकर आओ जिसने बचपन में हमको ये कह कह कर धोया था कि somebody gonna get a hurt real bad . और हाँ चलो फूटो यहाँ से. इतने देर से कुंडली जमाए बैठे हो. रात हो गयी है. Clause No 3.4 पढ़ा है ना.  रात को नो एंट्री. जाओ निकलो."

नरसिंह बेचारे अपना सा मुंह लेकर चले गए. पर उन्होंने कुछ कोशिशें और भी करी. 1-2 बार वापस भी आये .  वो जैसे BJP कुछ भी कर के कांग्रेस के विरोध में रहना अपना परम कर्तव्य समझती है, वैसे ही देवतागण असुरों के against रहने को ऐसा समझते हैं . बस धर्म का के आड़ में उन्हें असुरों को  मारना ही होता है, चाहे वो बाली के सामने वामन ही क्यूँ न हों.  अब ज्यादा डिटेल में क्या बताएं, एक दिन HK ने इस दलील को कि नाखून  न अस्त्र होते हैं न शस्त्र ये मानने से इनकार कर दिया. अब हाथ में रखे रखे जानलेवा चीज़ अस्त्र  कैसे नहीं हुई ये साबित करने में नरसिंह को रात हो गयी और फिर अपना सा मुंह लेकर जाना पड़ा. फिर किसी  दिन तो HK बिलकुल धरा ही गया था कि पता चला कि HK ने चालाकी से अपनी चौखट को कटवा कर बिलकुल महीन सा कर दिया था. उसपर नरसिंह अपना बैलेंस बना ही नहीं पाए. अब हमारे नरसिंह में तब तक हमारे भारतीय राजनेता वाले jeans  नहीं आये थे, नहीं तो वो भी कुछ न कुछ सोच ही लेते. उस दिन के बाद नरसिंह लौट कर नहीं आये. प्रहलाद पिटता रहा. और जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा हुआ और HK को लगा अब बेटा काम काज संभाल लेगा, किसी दूर के बस स्टैंड पर HK को छोड़ कर प्रहलाद चम्पत हो गया.  आखिरी दिन HK के किसी Old Age Home में कटे. अब वध न होने का वरदान  था. Natural Death  का तो नहीं था न. और प्रह्लाद का क्या था . हर घर में आज भी पाए जाते हैं. कभी पिटते हुए और कभी..

Monday, October 22, 2012

Gulzaar

These are some of the lines by Gulzar I came across describing sunset. If you have come across any better description of sunset, I don't want to know you or them. Just joking. Put them up in comments and I will tell you how they are inspired by Gulzar. :)

ज़रा सी देर पहले ही
जो सूरज बस गुरूब होने चला था 
एक उड़ते प्लेन के पहिये के नीचे आते आते बच गया था !

बिदका के हट गया था वो,
बहुत फिसलन थी और कायी जमी थी बादलों की 
पकड़ के आसमां, कोशिश भी की उसने संभलने की !

संभल पाया नहीं वोह गीले पैरों पर
गिरा और गोते खाते खाते पानी में ,
उफ़क के पार डूबा 'ग़प गुड़प गुबाश'

अभी तक आसमां पर कुछ घिसटती उँगलियों के दाग़ बाकी हैं ..

-Gulzar

Saturday, October 06, 2012

Beta


“ बेटे. 7 रुपये दे दे. बहादुरगढ़ जाना है. बस कि टिकेट के पैसे ना हैं म्हारे पास.”

ऑटो से उतारते ही आवाज़ उसके कानों में पड़ी. जाटों सी बोली. पारंपरिक हरयाणवी औरतों से बेरंग कपडे. कोई खास भिखारन वाली बात थी नहीं उस औरत में. पर ज़ाहिर सी बात थी कि acting अच्छी कर रही थी वो. तभी भिखारन लगने कि ज़रूरत भी नहीं थी.

पर वो भी गुडगाँव में 8 साल से रह रहा था. खूब पता था उसे. भिखारियों को ज्यादा इज्ज़त न तो वो दे सकता था ना ही उनकी झूठी कहानी पर यकीन कर सकता था.पच्चीसियों बार यहाँ से गुज़ारा होगा और दसियों बार इसी “भिखारन” ने टोका होगा. कभी झिडक कर कभी नज़रें झुका कर कन्नी काट जाता था.

पर आज काफी दिनों के बाद वो ऑफिस के लिए लेट नहीं हो रहा था. 1-2 दिनों में दिवाली का बोनस भी मिलने वाला था. उनके झूठ का इल्म आज भी था उसे. तभी शायद जेब में 7 रुपये छुट्टे होने के बावजूद उसने 10 का नोट निकाल कर पकड़ाया था. पर मानों वो तो गले पड़ गयी. ज्यादा अवाक् नहीं हुआ पर वो. बल्कि उसे पता था कि शायद ऐसा होगा. तो थोडा तैयार सा था.

“बेटा, 20 रुपये और दे दो. बहुत भूख लग रही है.”
“पर आपने तो बहादुरगढ़ जाना था ना. और वैसे भी इतनी सुबह सुबह कहाँ खाना मिलेगा आपको?”

आँखें थोड़ी कनफुजिया गयी थीं उसकी. 

“और ताई, वैसे बहादुरगढ़ क्यूँ जाना है आपको?”

तब तक एक और ऑटो आ गया था. उस महिला कि नज़र उस तरफ जाने लगी. हमारी कहानी के हीरो ने 20 रुपये निकाल कर उस “भिखारन” को पकड़ा दिए. और वापस ऑफिस की तरफ मुड़ने लगा. तभी पीछे से आवाज़ आई.

“बेटे अगर मेरा बेटा मुझे यहाँ छोड़ कर गायब नहीं हो गया होता ना तो आज तुझे बेटा कहने कि ज़रूरत ना होती शायद.”

सुना उसने. पर अनसुना कर दिया. वापस मुड़ने के लिए न शब्द थे न हिम्मत.  

Monday, October 01, 2012

Smoking Spills


(He hated smoke. It made him cough. It made him feel allergic. It made him feel imperfect . But it also made him feel different, a fact which he loved. Even as a kid , this confusion did nothing to mitigate this unambiguous hatred towards smoke. His worst nightmare was to be made to sit through a havan in his house. A nightmare,which often came true in his religious household.

But cigarettes. Ooh, they were a different matter. They were always fascinating. As a kid, he always loved how in Hindi movies smoking was used to create hierarchy in villain’s world. The top villain used to smoke pipes or cigars. His henchmen had cigarettes and the guys from the lower rung who did all the dirty work managed with the beedis. You could gauge the growth of a bad person by the change in his smoking habits. The way cigarettes were used to portray characters felt cool to him. Of course he never smoked. He was too young to do that. But once he rolled up a paper , put an end on fire and tried to inhale some smoke from the other end. He didn't remember if he managed any smoke but the soot and ash which settled in his throat left him coughing for hours. Maybe, days. He couldn't remember well at the moment.

Then he got into college where many of his friends smoked. He though didn't allow any of them to smoke in his room. He felt asphyxiated due to smoke if anyone did so. And apart from that he was also afraid that living in a room full of smoke will make him grow allergic to the allergy of smoke robbing him of the trait of being different from his mates because he didn't like smoke. But still cigarette was sacrosanct in his fascination. That cigarette came with smoke was its only drawback.

It was dark, the room. But his eyes were lightening. So was the matchstick in his hand. Within moments, the cigarette he had smuggled in this dingy, secluded store room of Mechanics Laboratory of college was also lit.  He lifted the cigarette up to his lips. Hands trembling, he dropped it soon enough without any action. He hurriedly took his mobile out, turning on its flashlight. He was almost afraid if anybody around had heard the sound of the cigarette falling. This time he was more determined, so steadier. He pursed the cigarette between his lips to avoid it falling again and lit it. He didn't want to be termed a mouth-fagger by his friends. A term for those who didn't take the smoke in. Those who didn't burn their lungs. Jo bas munh kadwa karte thay. So the cigarette lit, he took a deep drag inside. And, he choked out.)

After a night of hash-session ,this was all he remembered in his trance. Remembering even this much was a chore while being what one calls “being high”. Even the Pink Floyd sounded slower to him, if it was humanly possible that is. But he wanted to think and try to remember. It sounded like a good story to him. And he hoped that thinking will help him to fall asleep.

When did it all start then? It must have been when that bitch broke his heart when he had his full cigarette. He didn’t want to think of her as a bitch. After all, she helped him fulfill his lifelong ambition to smoke a full cigarette, albeit inadvertently. Besides she was his first love in life. She could never be a bitch. But some fucker with the music control had played “Good bye cruel world” and the bitch turned up. The pain might have made him forget that he had to choke over after every drag.  And thus it started, or maybe not. The day on which he had his first full cigarette might have been a different day for all he remembered. But this heartbreak and the bitch made a good story and a comforting thought.

He understood the allure now. He once went to a high end working place in Delhi for a job interview. Coming from a small place, he was amused to see girls smoking openly with others. He searched on internet for the videos of girls smoking when he went home. Only then did he realize that what he thought as amusement was actually a form of sexual gratification. And only later during a post-coital smoke when he offered the cigarette to the girl and she refused did he realize that the gratification did not come from the girl, but from the cigarette she smoked. Since then he had only dated the girls who smoked as well. Did he date the girls or the cigarette, he couldn’t decide at the moment.

He started regular smoking by placing a table fan behind him while he smoked so that the smoke coming wouldn’t bother him. But as the frequency grew, it became cumbersome for him to get hold of a table fan whenever he had the urge. Soon, this pretence was also done away with. And from then, the present day was never far off. This smoke filled room was slowly disjointing him from the memories of the havan room full of smoke of childhood and of his first love who didn't smoke either. He was slipping into sleep. Somebody had changed the music to “Have a Cigar”.

He was lying in the bed of a hospital. All kinds of wires were attached to his old, wrinkled hands and was surrounded by numerous medical paraphernalia. He could see a man outside his room through the glass door on which ICU was printed in bold and in red.  His blurry vision only afforded him a silhouette of the man. It slowly raised a cigarette to his lips and walked away leaving smoke rings behind him free to enter the old man’s ICU room. He struggled wildly to shoo away the smoke but he felt too weak for that. He hated the smoke. It made him cough. It made him feel imperfect. It made him feel dead.

He woke up with a start. It was morning already. He lit a cigarette and ambled towards the toilet. He still remembered the dream vividly. Was it divine signal? An omen from the Gods, maybe? He shrugged off the thought and took a deep drag inside. He wasn't high anymore.